रावण का पुतला बनाते बीत गई 3 पीढ़िया, ग्वालियर राजवंश से चली आ रही कुशवाहा परिवार पर जिम्मेदारी
ग्वालियर: बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता दशहरा भारतवर्ष में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. जिस रावण को बुराई का पर्याय माना जाता है, वहीं चेतराम कुशवाहा और उनका परिवार का एक महीने भरण-पोषण करता है. पूरे ग्वालियर-चंबल में बनने वाले रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के सबसे बड़े पुतले दहन के लिए चेतराम कुशवाह ही तैयार करते हैं. उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी ये काम करता चला आ रहा है.
इस बार 65 फीट के रावण का होगा दहन
ईटीवी भारत से बातचीत में कलाकार चेतराम ने बताया कि "इस साल ग्वालियर में 4 जगह बड़े पुतले दहन होंगे. इसके लिए पिछले एक महीने से उनकी अलग-अलग टीम 4 जगह पुतले तैयार कर रही है. जिसमें फूलबाग रामलीला आयोजन समिति की और से 60 फीट का रावण तैयार कराया जा रहा है. सबसे बड़ा रावण 65 फीट का तैयार कराया जा रहा है, जो डीडी नगर के दशहरा मैदान में जलाया जाएगा."
पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही कलाकारी
रावण दहन के लिए पुतले तैयार करने का काम कुशवाह परिवार 3 पीढ़ियों से करता आ रहा है. आजादी के पहले से ग्वालियर में पुतला निर्माण का काम कुशवाहा परिवार कर रहा है. चेतराम खुद पिछले 40 वर्षों से ये काम कर रहे हैं. उनसे पहले उनके पिता और अब उनका बेटा विशाल, उनके भाई और परिवार के अन्य लोग इसमें शामिल हैं. आजादी से पहले रावण दहन का मुख्य समारोह ग्वालियर रियासत के महल में आयोजित होता था. आज जगह-जगह रावण दहन होते हैं. जिसके लिए गणेशोत्सव से ही ये कलाकार अपने काम में जुट जाते हैं.
4 दशक में दोगुनी हो गई रावण की ऊंचाई
चेतराम ने बताया कि "रावण का पुतले बनाना हर साल चुनौती बनता जा रहा है, क्योंकि बीते साल के मुकाबले हर साल पहले से बड़े पुतलों की डिमांड होने लगी है. 4 दशक पहले जब चेतराम ने यह काम संभाला था तो उस दौरान अंचल में 25 से 30 फीट के पुतले बनवाए जाते थे, लेकिन आज इनकी ऊंचाई दोगुनी हो चुकी है. इस वजह से अब खर्च भी बढ़ गया है. 60 फीट का रावण बनाने में करीब 50 हजार रुपए की लागत आती है, जबकि इसमें आतिशबाजी का खर्च शामिल नहीं होता."
'पेट भरने के लिए करने पड़ते हैं दूसरे काम'
चेतराम को रावण बनाने में एक महीने का समय लगता है. ये इनकी पारिवारिक विरासत है, लेकिन एक त्योहार तक सीमित कला परिवार का पेट पालने के लिए नाकाफी है. चेतराम कहते हैं कि "पुतला बनाना परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए है, लेकिन इससे परिवार का पेट नहीं भरता. ऐसे में एक महीना पुतलों को देते हैं, लेकिन बाकी के 11 महीने ठेकेदारी और अन्य कामों पर निर्भर होना पड़ता हैं. जिससे घर का चूल्हा जल सके और सबको भरपेट रोटी मिल सके."
एक महीने से जारी है मेहनत
फूलबाग मैदान पर चेतराम और उनके साथी मौसम की चुनौतियों के बीच दशहरे के लिए पुतले तैयार कर रहे हैं. रावण, विभीषण और मेघनाद के पुतले अलग-अलग हिस्सों में बनाए जा रहे हैं. इसके लिए कागज और लकड़ी के फ्रेम का इस्तेमाल किया जा रहा. चेतराम के मुताबिक इन पुतलों को पेंटिंग और सजावट के साथ फाइनल टच देकर वे आयोजकों को सौंप देंगे. इनमें आतिशबाजी का काम अलग से किसी आतिशबाज के द्वारा कराया जाएगा और उसके बाद इसका दहन किया जाएगा.

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